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August 3, 2020

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आत्मबल और राष्ट्रभाव के साथ आगे बढ़ रही भारत की बेटी पार्वती जांगिड़ सुथार

‘‘लड़की का जन्म कहाँ हुआ है, गरीब के घर या अमीर के घर, गाँव में या शहर में, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, वह भी भव्य सपने देखने की हकदार है और हम सब मिलकर ही उसके सपने को पूरा कर सकते है।‘‘ यह सोच है मूलतः बाड़मेर के गागरिया गाँव की हाल जोधपुर निवासी पार्वती जांगिड़ सुथार की। छोटी सी उम्र से ही वो न केवल स्वयं समाजसेवा करती है बल्कि महिलाओं और युवाओं में राष्ट्रभाव जागरण के साथ ही आत्मबल जागरण का अनुठा कार्य पूरी प्रखरता से करती है। युवा संसद,भारत की चैयरपर्सन एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष सुश्री पार्वती से राष्ट्रीय चैनल डी.डी.न्युज की संवाददाता मोनालिसा, दूरदर्शन प्रोग्रामिंग सह-निदेशक हंसराज नायक, राष्ट्रवादी चिंतक डाॅ.मोहन ने विस्तृत बातचीत की, जिसके प्रमुख अंश यहां प्रस्तुत है।

 ‘‘भारत श्री‘‘ सोच की प्रणेता

 

बहुत मुश्किल होता है अपने प्राण से भी प्यारी संतान को देश पर न्योछावर कर देना और उसके शहीद होने पर ये गम मानना कि काश एक और संतान होती जिसे भी देश पर न्योछावर कर  सकते। ऐसी सोच रखने वाले माता-पिता और उन्हें समर्थन देने वाली वीरांगना फौजी पत्नियां भी एक श्रैष्ठ देशभक्त के समान, सम्मान की हकदार है। इसी सोच के चलते पार्वती ने ‘‘भारत श्री‘‘ सम्मान की नींव रखी।  इसमें  शहीदों के परिवार जनों (माता-पिता और पत्नी) को ‘‘भारत श्री‘‘ के सम्मान से नवाजा जाता है। पार्वती का कहना है शहीद होने वाले जवानों की शहादत अमर-अक्षुण्ण है। देश के असली हीरो, भारत श्री यही वीर योद्धा है। सरकारें भिन्न-भिन्न क्षैत्रों में श्रैष्ठ काम करने वाले लोगों को पद्म श्री इत्यादी सम्मान देती है लेकिन देश के इन वीर शहीदों को देश की जनता की तरफ से यह ‘‘भारत श्री‘‘ सम्मान समर्पित है। पार्वती लोगों से अपील भी करती है कि इनके नाम से पहले ‘‘भारत श्री‘‘ का सम्बोधन अवश्य लगावें। और लोंगों में यह अपनत्व की भावना फैला सुनिश्चित कर रही है कि शहीद का परिवार पूरे देश का परिवार है विशेष उस गाँव या क्षैत्र जहाँ शहीद परिवार रह रहा है, उनके सुख-दुःख में हमेंशा साथ दें।

 कई कीर्तिमान दर्ज है पार्वती के नाम

यूथ पार्लियामेंट की स्थापना करने वाली पार्वती के नाम कई कीर्तिमान दर्ज है। पार्वती विश्व के सबसे बड़े सामाजिक अभियानों में से एक ‘‘गर्ल राइजिंग-सेव दी गर्ल चाइल्ड एंड एजुकेट देम‘‘ की गर्ल राइजिंग एम्बेसडर है। इस अभियान से अमेरिका की पूर्व और वर्तमान फस्र्ट लेडी, अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा व कई विश्व प्रसिद्ध महिलायें जुडी हुई है। साथ ही वह दैनिक भास्कर वीमेन प्राइड अवार्ड के तहत देश की शीर्ष तीन महिलाओं में से एक रह चुकी है। पार्वती बी.एस.एफ. के स्वर्ण जयंती समारोह-2017 में एकमात्र सिविल पर्सन थी जिसे बी.एस.एफ. की ओर से सम्मानित किया गया। क्योंकि पिछले कई सालों से हर साल बॉर्डर पर तैनात सीमा सुरक्षा बल के जवानों को राखी बांधती आ रही है और उनका हौंसला अफजाई करती है, साथ ही सेना और आमजन के बीच सामंजस्य कायम रखने में भी भूमिका निभाती है। पार्वती के सामाजिक कार्यों के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणबमुखर्जी ने और राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह सहित कई मंत्रियों ने भी हौंसला अफजाई की है। दर्जनों पुरस्कारों एवं ‘‘विश्वकर्मा रत्न‘‘ और ‘‘भारत गौरव‘‘ से सम्मानित पार्वती को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी पत्र लिख कर शुभकामनाऐं दे चुके है तो वहीं वाईट हाउस, अमेरीका ने भी पार्वती के कार्यों को सम्मान देते हुए अमेरिकन प्रेसिंडेंटियल ईगल पिन प्रदान की। नोबेल शांति पुरस्कार विजेता व यू.एन. की शातिं दूत मलाला युसूफजई ने भी पार्वती के कार्यों और विचारों को अद्धभूत बताते हुए बधाई पत्र भेज समर्थन किया।

 

प्रचार के पीछे का तर्क समझकर तर्कपूर्ण प्रचार जरूरी

पार्वती उन चन्द महिलाओं में से है जो दिखावे को छोड़ तर्कपूर्ण तरिके से महिला सशक्तिकरण को प्रचारित करती है।  पार्वती का मानना है कि स्त्री और पुरुष की समानता को लेकर जो अंध प्रचार है वो वास्तव में महिला सशक्तिकरण से ध्यान हटाने मात्र है। स्त्री और पुरुष के समानता की बात ही कहाँ उठती है। स्त्री तो हमेशा से पुरुष से ज्यादा सम्माननीय रही है। वो बात और है कि वक्त  के साथ साथ पुरुष प्रधान समाज के तथाकथित ठेकेदारों द्वारा स्त्री का शोषण होने लगा और वो शोषण अपनी चरम सीमा पर पहुंचकर कब रिवाजों में बदल गया और कब अलग अलग धर्म के ठेकेदारों ने अपनी सहूलियत के अनुसार नियम कायदे थोप दिए कोई नहीं जानता। आज जागरूकता स्त्री पुरुष के समानता की नहीं बल्कि स्त्रियों पर लागू कुरीतियों और शोषण की सोच को खत्म करने की है। इन कुरीतियों और शोषण जनक सोच से ध्यान हट जाये और नारी का पक्ष कमजोर हो जाये इसके लिए पाश्चात्य संस्कृति को दुष्प्रचारित कर भ्रमित किया जा रहा है। जहाँ पायल नारी के पैर की शोभा हुआ करती थी वो आज उसे बेड़ियाँ लगने लगी है, जो मातृत्व सुख हुआ करता था वो आज बंधन लगने लगा है, आजादी के नाम पर फूहड़ता घर कर रही है, संयुक्त परिवार की जगह एकाकी परिवार की प्रथा चल पड़ी है, जिन्दगी की जरूरत समझे जाने वाले माता-पिता को वृद्धाश्रम तक भेजने में संकोच नही रहा । और यह सब फिर से चरम पर पहुँचकर नारी के खिलाफ ही जायेगा । जिस शिक्षा को नारी के लिए अनिवार्य करवाने की जुगत में अनेकों अनेक सामाजिक संस्थाएं लगी हुयी है उसी शिक्षा की आड़ लेकर असामाजिक ताकतें पाश्चात्य संस्कृति को प्रोत्साहित कर रहे है।     

 

महिलाओं का सामाजिक योगदान महज एक औपचारिकता मात्र रह गया है। आज हर क्षेत्र चाहे वो राजनीति हो, शिक्षा जगत हो, विज्ञान और आविष्कार हो, कानून व्यवस्था हो, व्यवसाय हो, या कोई भी क्षेत्र हो, हर क्षेत्र में महिलाएं शीर्ष पदों पर आसीन है। जरूरत है तो कुरीतियों को और गलत सोच को मिटाने की। महिलाओं से जुड़ी समस्याओं को सुलझाने की। बेटी बोझ है मानने वालों की सोच बदलने की, सामाजिक तौर पर मूलभुत सुविधाएं उपलब्ध करवाने की। यह कार्य बिना महिलाओं के सहयोग के अधूरा है। पहली सोच उन्हें ही बदलनी होगी। पिछड़े क्षेत्रों में आज भी बालिकाओं को उनके शारीरिक बदलाव के बारे में जागरूक करने वाला कोई नहीं, गाँवो में बहुत ही सस्ती दरों पर सैनिटरी पैड्स उपलब्द्ध हो, ऐसे क्षैत्रों में सेनेटरी नैप्कीन जैसी सुविधाएं और उनके निस्तारण के तरिके बताने के सम्बन्ध में जागरूकता बेहद जरूरी है। इसके  अलावा भी और भी भ्रांतियां है और अज्ञानता है जिसे मिटाना जरूरी है।

Sister of BSF

पंजाब को सटे भारत-पाकिस्तान बॉर्डर पर इस वर्ष सुश्री पार्वती द्वारा रक्षाबंधन के तीन दिन पहले से लगातार सात दिन तक "भारत रक्षा पर्व" मनाया गया, इस दौरान पूरे पंजाब प्रदेश की अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर तैनात फौजी भाइयों को रक्षा सूत्र बाँध, उनकी दीर्घायु की मंगलकामना की गई।  अंतिम दिन सुश्री जांगिड़ के सम्मान में Sister of BSF कार्यक्रम रखा गया, कमांडिंग ऑफिसर बी एस ऍफ़  श्री एम पी सिंह  द्वारा उद्धगार। 

 

 

 

मनमाफिक शिक्षा की आजादी मिले

पार्वती कहती है आज के दौर में बचपन खिलने की बजाए मुरझाता जा रहा है। मेरा मानना है कि मासूम चेहरों पर खुशी लाने की पहली कोशिश के तहत हमें बच्चों को आजादी दी जानी चाहीए। इसका मतलब यह नहीं की हम उन्हें जो जी में आए करने दें लेकिन हमें उन्हें इतनी तो छूट देनी ही होगी कि वो अपने मन मुताबिक शिक्षा हासिल कर सकें। प्रारंभिक शिक्षा हर बच्चे को मिले फिर वह लड़का है या लड़की, उसके बाद उसके पसन्द का प्रशिक्षण मिले, हर माता-पिता से निवेदन करना चाहुँगी कि वो अपनी चाहत बच्चों पर ना थोपें। उन्हें उनके पसंदीदा क्षैत्र में जाने के लिए प्रेरित व सहयोग करें। मेरे परिवार की इच्छा थी कि मैं डाॅक्टर बनूं लेकिन उचित समय पर मेरे माता-पिता ने पाया कि मैं डाॅक्टर बनने के लिए पैदा नहीं हुई हुँ। उन्हें मेरे अंदर एक लीडर दिखने लगा, मुझमें एक राष्ट्रवादी चिंतक नजर आने लगा, उसी चिंतन के कारण आज आप सबके बीच पार्वती जाँगिड़ नाम का एक सामाजिक कार्यकत्र्ता, एक युवा चिंतक पेश हो गया।

दुनिया का हर बच्चा माँ-बाप के साथ रहे और हर बुढ़े माँ-बाप को औलाद का प्यार मिले

आज परिवार का टूटना आम बात सी हो रही है, यह समाज के लिए गंभीर सोचने की बात होनी चाहीए। माॅर्डन सोसायटी में हसबैंड-वाइफ के बीच छोटी-छोटी सी बात पर हो रहे अलगाव का असर बच्चों पर पड़ रहा है, सेप्रेशन के बाद पति-पत्नि तो किसी दूसरे के साथ अपनी जिन्दगी का रास्ता तलाश लेते हैं लेकिन बच्चे कहां जाएं। उनकी जिन्दगी तो दोजख सरीखी हो गयी, बगैर माँ-बाप के जिन्दगी गुजार रहे बच्चे का कलेजा खुशगवार रहे, ये कैसे हो सकता। उसके चैहरे की मुस्कान मर सी जाती है, बच्चों की खातिर यह स्थिति बदलनी होगी। दूसरी ओर बुढ़े माँ-बाप वृद्धाश्रम में रहने को मजबूर हो रहे है। जिन माँ-बाप ने बच्चों को पढ़ा-लिखा कर बड़ा बनाया, औलाद की खातिर अपनी खुसियों की बलि दी, आज वही औलाद, उन्हें वृद्धाश्रम में छोड़ रहा है। ऐसा संस्कारहीन समाज का निर्माण न हो, अभी भी समय है स्कूलों में शिक्षा के साथ-साथ संस्कार दिए जाएं। हम सब प्रार्थना करें कि हर बच्चा माँ-बाप के साथ रहे और हर बुढ़े माँ-बाप को औलाद का प्यार मिले, यह वर्तमान की सबसे बड़ी मांग है।

 

समाजसेवा की प्रेरणा कैसे मिली और युथ पार्लियामेंट के गठन का मूल उद्धेश्य

समाज में मौजूद अनेक बुराइयों एवं दूसरों की कमियों पर चर्चा करने वाले लोग हर मोड़ पर मिल जाते हैं। लेकिन उस पर समर्पण भाव से काम करने वाले लोग बहुत ही कम मिलते हैं। मेरी विद्यालयी शिक्षा सौभाग्य से बालिका आदर्श विद्या मंिदर में हुई, जहाँ श्रैष्ठ मानव निर्माण की शिक्षा पहले दी जाती है, फिर किताबी ज्ञान। 2013-14 में मैं घर से सिविल सर्विसेज की तैयारी के लिए एक संस्थान में जाती थी, एक दिन रेल्वे अंडरब्रिज के नीचे से जैसे ही मैंने क्राॅस किया तो पाया कि कुछ लोग और गाड़ीयों पर आते-जाते लोग एक महिला को जो अर्धनग्न अवस्था में सड़क किनारे बैठी थी उसे देख रहे है और कुछ हंस रहे है। उस महिला के प्रति लोगों के रवैये ने मुझे अंदर तक हिला दिया। मैं उसके पास गई, मैंने देखा की वो महिला मानसिक रूप से विक्षिप्त है, मैंने मेरी चुनी(दुपटे) से उसके अर्ध नग्न शरीर को ढका, उस समय कुछ युवा थोडे पास खड़े थे, उन्हें देख मेरे मुंह से सिर्फ इतना ही निकला हद हो गई और मैं कोचिंग चली गई लेकिन उस दृष्टांत ने मेरे मन में हल-चल तो मचा दी लेकिन आत्म संतुष्टि भी मिली, अंदर से ऐसे भाव आने लगे कि अच्छा किया, बहुत अच्छा किया पार्वती। मैंने सोचा दुनिया तो बहुत बड़ी है। बहुत लोग दुखी है। गंदी मानसिकता के लोग भी अंसख्य है। लेकिन मुझे उसमें परिवर्तन का प्रयास करना चाहिए, महिलाओं के प्रति लोगों की सोच बदले, जरूरतमंद की सेवा हो, इस हेतू मुझे लग जाना चाहिए। फिर जब समय समय पर मेरे गृह जिले, आस पडौ़स की घटनाऐं सुनी, बालिकाओं के प्रति लोगों की सोच देखी, हमारे बाड़मेर-जैसलमेर तो बेटियाँ मारने वाले जिले के नाम से जाने जाते थे, हालात इस कदर खराब थे की ऐसे भी गांव हुए जहाँ 100-100 साल तक बारात नहीं आई थी। तो कहीं पर बाल विवाह चरम पर था, आज भी पश्चिमी राजस्थान में काफी सोचने वाली बात है। मैंने भी ऐसे हालातों का सामना किया है, लेकिन कुदरत को कुछ और मंजूर था। आज हालात बदल गये है और मैं ही नहीं पश्चिमी राजस्थान की बहुत सी बेटियों ने भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में गाँव, जिले, अपने क्षैत्र का नाम रोशन किया हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि बुराइयाँ खत्म हो गई है, या बाल विवाह रूक गये या युवा गलत राह से बाहर आ गया।

आज भी आवश्यकता है महिलाओं में विस्मृत हुए आत्मबल को फिर से जाग्रत करने की, महिलाओं और युवाओं में राष्ट्रभाव जागरण के साथ ही आत्मबल जागरण हो, संविधान के साथ-साथ संस्कृति का भी ख्याल रखा जाए, इन्हीं उद्धेश्यों को ध्यान में रखते हुए, युथ पार्लियामेंट की स्थापना की गई। जो राष्ट्रीय महत्व के विषयों के साथ-साथ समाज में उत्पन्न भिन्न-भिन्न मुद्दों पर काम करते हुए, राष्ट्र-निमार्ण में लगी रहेगी।

 

समाजसेवा में कैसी कैसी परेशानीयां आ रही है

एक-दो उदाहरण देती हूँ, विशेष ध्यान देना,

ऐसा समाज या यूँ कहीए की ऐसी थोपी हुई परंपराएँ जहाँ महिलाओं को घर से बाहर निकलने के लिए 10 बार सोचना पड़े और मैं बाॅर्डर की सोचूँ, युवाओं की बात करूँ।

छोटी-छोटी बालिकाऐं कोई उद्यान या मैदान में खेल रही हो, या शारीरिक अभ्यास कर रही हो तो  लोगों द्वारा उसका उपहास करना, गलत मानसिकता से देखना।

मात्र 3-4 साल की बालिका के साथ शारीरिक शोषण की घटना सुनने को मिले।

धनबल में प्रगाढ़ लोग जब समाजसेवा के नाम पर समाज का शोषण करे, लोगों को प्रभावित करने के लिए बड़े-बड़े चमचमाते विज्ञापन, ऐसे माहौल में स्वाभाविक है परेशानीयां आना। लेकिन ईश्वरीय और राष्ट्र कार्य में हिम्मत बढ़ती जाती है और यह परेशानीयां और चुनौतीयाँ साइड में रह जाती है।

पहली खुशी

पहली-दुसरी खुशी का तो पता नहीं लेकिन हाँ जब मेरे पिता स्व.श्रीलूणाराम जी एक बार भैया को मेरी तरफ इशारा कर कह रहे थे कि यह बेटी है लेकिन मैं इसे बेटे से भी ज्यादा समझता हुँ। बेटे के मोह में दूसरी-तीसरी शादीयाँ करने वाले पुरूष प्रधान समाज में इस दृश्य ने मुझे बहुत आत्म-सुकुन दिया, बहुत खुशी हुई। पिताजी कहते थे लोग बाप के नाम से जाने जाते है लेकिन मैं खुशनसीब हुँ कि मैं बेटी के कारण जाना जाता हुँ। राष्ट्र के शीर्ष इत्यादी श्रैष्ठ लोगे जब मुझे आशीर्वाद के लिए बुलाते और हौंसला अफजाई करते, प्रशंसा करते यह सब देख पापा के खुशी के आंसू निकलते थे, उस समय भी मुझे बहुत खुशी होती थी।

एक ओर घटना बताती हुँ मुझे पता चला की धोरीमना क्षैत्र की एक 12-13 साल की बालिका को कोई गंदी नीयत से अपहरण कर ले गया लेकिन 20 दिन बाद भी लड़की का पता नहीं चला, पुलिस कोई कार्यवाही नहीं कर रही थी। मैं उसी दिन उसके परिवार से मिली, सब पता करने की कोशिस की, मैंने संबधित अधिकारी से बात की, उसी समय राजस्थान पुलिस के तत्कालीन महानिदेशक श्री मनोज भट्ट से मिल तुरंत प्रभाव से कार्यवाही करने और वह  बालिका सुरक्षित मिले, यह सुनिश्चित किया। और ईश्वर कृपा से पुलिस ने उस आदमी को तीसरे दिन गिरफ्तार कर, बालिका को मुक्त कराया। तथा लापरवाह पुलिसवालों पर भी विभाग ने कार्यवाही की।

इस प्रकार के कार्य करने और लाभान्वितों से जब आशीर्वाद मिलता है, उनके खुश चेहरे देख मुझे बहुत खुशी मिलती है।

 

राष्ट्र को संदेश

हर इंसान अपने अपने कार्यों को ईश्वरीय कार्य मान, राष्ट्र प्रथम की भावना से पूर्ण ईमानदार से कार्य करता जाए तो भारत को पुनः विश्वगुरू बनने में देर नहीं लगेगी। विशेष युवाओं से कहना चाहुँगी की हम सब युवा भारत का भविष्य हैं, हमें व्यसन,व्यभिचार,भ्रष्टाचार मुक्त रहते हुए अपनी जवानी को राष्ट्र के लिए समर्पण भाव से काम करना है। हजारों-लाखों बुराइयाँ होगी, हजारों-लाखों लोग दुःखी होंगे, आप सबका दुःख या सब बुराइयों को खत्म नहीं कर सकते ऐसा सोच कर आप हाथ पर हाथ धरे बैठ जाते हो तो यह आपकी नपुशंकता है। उठिए,भारत माँ पुकार रही है, आप सामथ्र्यानुसार तो सेवा कर ही सकते हैं। किसी एक की तो मदद कर ही सकते है आपका एक को किया गया सहयोग निश्चित रूप से 1000 जरूरतमंदों के आंकड़े को 999 पर लाएगा। इस प्रकार एक श्रैष्ठ माहौल जरूर बनेगा। आप अपनी ओर से राष्ट्र-निमार्ण में योगदान देते रहें।

भारत अपना हो महान, यह हर व्यक्ति का सपना हो।

औरों को मत देखो, सोचो योगदान क्या अपना हो।।

आइए हम सब संकल्प करें कि हम भीड़ होकर नहीं बल्कि एक श्रैष्ठ मनुष्य होकर ‘‘वसुधैव कुटुंबकम‘‘ की भावना से जिऐंगे। धन्यवाद।।

 

 

 

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