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निर्मल ह्रदय, निराश्रितों के घर बने बीजेपी नेता कपिल मिश्रा

चार दिनों में क्राउड फंडिंग से हिन्दू दंगा पीड़ितों के लिए जुटाए एक करोड़ से भी ज्यादा, प्रोड्यूसर मनीष ने दिए 10 लाख रुपये

कपिल मिश्रा ने इतनी मोटी रकम दान करने के लिए मनीष को शुक्रिया कहा है। बुधवार को कपिल मिश्रा ने ट्वीट कर कहा था कि एक करोड़ रुपये की रकम होने में 4 लाख रुपये कम पड़ रहे हैं, जिसके बाद मनीष का 10 लाख रुपये का दान आ गया।


नई दिल्ली:

कपिल मिश्रा भले ही हालिया दिल्ली विधानसभा चुनावों में हार गए हों लेकिन दंगों के बाद जनता की मदद करने के लिए दिल्ली का दिल जीत लिया।

जब दिल्ली सरकार का कोई मंत्री-विधायक इन पीड़ितों की मदद के लिए नहीं पहुँचा तो कपिल मिश्रा ने यह मदद का बीड़ा उठाया। कुल 1 करोड़ रुपए जमा करने का लक्ष्य रखा गया था, जो पूरा हो चुका है। अब वो और डोनेशन नहीं लेंगे। इन रुपयों में से कई लोगों की मदद की गई है औरों की की जा रही है। मिश्रा सोशल मीडिया के माध्यम से लगातार अपडेट कर रहे हैं कि इन रुपयों में से किसे कितना दिया जा रहा है। जनता के धन में से एक-एक पैसे का हिसाब उन्हें दिया जा रहा है।


रविवार को बीजेपी नेता ने सभी एनआरआई और ग्लोबल हिंदू वर्ल्ड से पीड़ितों की मदद के लिए चंदा देने की अपील की थी। कपिल मिश्रा ने मिलाप.ओआरजी का ट्विटर पर लिंक शेयर करते हुए रविवार को लिखा, '14 परिवार जिनका कोई अपना दंगो में मारा गया। सैकड़ों परिवार जिनकी रोजी रोटी सब नष्ट हुई। 150 से ज्यादा जिन्हें गोली लगी या गंभीर रूप से घायल। मैं सभी NRIs और ग्लोबल हिंदू वर्ल्ड से अपील करता हूं। खुले दिल से मदद कीजिए' 'दिल्ली दंगा पीड़ितों की मदद' नाम से बनाए गए पेज पर दंगों में मारे गए 14 हिंदुओं का ब्योरा दिया गया है। क्राउड फंडिग के लक्ष्य की जानकारी देते हुए लिखा गया है, 'कपिल मिश्रा और उनकी टीम ऐसे परिवारों की मदद के लिए 24 घंटे काम कर रही है। इस फंड रेज का लक्ष्य हर पीड़ित हिन्दू परिवार को इस दुःख की घड़ी में हरसंभव मदद देना है।' बताया गया है कि यह कैंपेन धर्म कोष की ओर से चलाया जा रहा है। यह धार्मिक वॉलेंटियर्स का एक समूह है जो कपिल मिश्रा के साथ काम करती है।

https://twitter.com/KapilMishra_IND/status/1240185236211691521

https://twitter.com/KapilMishra_IND/status/1239222745654689804

कपिल मिश्रा के इस प्रयास से ‘द प्रिंट’ खफा हो गया

कपिल मिश्रा के इस प्रयास से ‘द प्रिंट’ खफा हो गया है। शेखर गुप्ता के प्रोपेगंडा पोर्टल को इस बात से भी दिक्कत है कि एक-एक रुपया देने वाले लोगों के ट्वीट्स को भी कपिल मिश्रा रीट्वीट क्यों कर रहे हैं। उसने लिखा है कि ‘दंगे भड़काने के आरोपित’ कपिल मिश्रा क्राउडफंडिंग कर रहे हैं। अगर ऐसा है तो ताहिर हुसैन पुलिस कस्टडी में किस बात के लिए है? समाजसेवा के लिए? अंकित शर्मा की हत्या करने वाले कौन लोग थे? कॉन्सटेबल रतन लाल की हत्या किसने की? और हाँ, दिल्ली दंगा शुरू होने के समय हाथ में पिस्तौल लहराते हुए पुलिस पर गोलीबारी कर रहा शाहरुख़ कौन था? क्या इन सबको बचाने के लिए कपिल मिश्रा का नाम बार-बार दोहराया जा रहा है? यहाँ सवाल ये है कि जब पूरा मीडिया हिन्दुओं के दुःख-दर्द को छिपाने में लगा हुआ है और दंगाइयों के कुकृत्यों को ढकने में प्रयासरत है, कोई एक व्यक्ति यदि पीड़ितों के हित के लिए उठ खड़ा हुआ है तो इन प्रोपेगंडा पोर्टलों को पच क्यों नहीं रहा? किसी मुसलमान को एक झापड़ लगने वाले आरोप को किसी हिन्दू को सैकड़ों बार चाकू गोद कर मार डालने से तुलना करने वाले इन पोर्टलों की ये पुरानी आदत है। ‘द प्रिंट’ इस बात के लिए भी खफा है कि कपिल मिश्रा ने उसके पत्रकारों से बात क्यों नहीं की। मिश्रा ने उन्हें पहले ही लताड़ लगाते हुए बता दिया था कि वो फेक न्यूज़ और प्रोपेगंडा फैलाने वालों से बात नहीं करेंगे। उन्होंने कहा था: “तुम्हारा न्यूज़ पोर्टल ‘द प्रिंट’ एक पक्षपाती फेक न्यूज़ फैक्ट्री है। बावजूद इसके कि तुमलोग मेरे ख़िलाफ़ लगातार एक घृणास्पद अभियान चला रहे हो, मुझे चारों ओर से भारी समर्थन मिल रहा है। ज़मीन पर तुम जहाँ भी लोगों से बात करोगे वहाँ से मेरे लिए समर्थन आएगा लेकिन ‘द प्रिंट’ जैसी फेक न्यूज़ फैक्ट्री को ये पसंद नहीं। मुझे ज़रूरत ही नहीं है कि अपना समर्थन साबित करने के लिए तुम्हारे पोर्टल में लेख प्रकाशित करवाऊँ। दिल्ली की जनता ने तुम्हारे प्रोपेगेंडा को नकार दिया है। तुम जाकर इस पर लेख लिखो कि मोहम्मद शाहरुख़ बचपन में कितना क्यूट था। तुम लिखो कि कैसे ‘बुरे हिन्दुओं’ ने ताहिर हुसैन को एक आतंकवादी बनने के लिए मजबूर कर दिया।” ये पूरा गिरोह बार-बार हिन्दुओं को पीड़ित मानने की जगह ‘दोनों ही तरफ के लोग मरते हैं’ वाला राग अलाप रहा है। जबकि सत्य यह है कि मुसलमान भीड़ ने दंगों की अच्छी-खासी तैयारी की थी। अगर कोई अपने समुदाय को ले कर कुछ करना चाहता है तो समस्या क्या है? क्या फंड जुटाना गुनाह है? क्योंकि पहले तो दंगे का पीड़ित ही इन्हें नहीं मान रहे थे, अब लाशें सामने हैं तो नए गीत रचे जा रहे हैं। पीड़ितों के लिए पैसा इकट्ठा करना अमानवीय और विभाजनकारी कैसे है? चूँकि चार चम्पुओं से बयान ले लिए गए कि ये अनैतिक है, मानवीय मूल्यों के खिलाफ है, भेदभाव करता है, उससे ये साबित नहीं हो जाता कि मरने वाले हिन्दू परिवारों को लोगों की हत्या नहीं हुई है। जिनके बच्चे मरे, जिनकी बेटियों को नग्न करके दुराचार किया गया, जिनकी शादी में सिलिंडरों को उड़ाने की योजना थी, जिनके बच्चों को छः मुसलमानों ने दो-दो घंटे चाकू मारे… उन्हें अब आर्थिक मदद से भी महरूम किया जाएगा?


दिलबर नेगी का हाथ-पाँव काट कर उसी दुकान में लगाई आग में जिन्दा झोंक दिया गया, जिसमें वो काम करते थे। विवेक अपनी दुकान में बैठे थे, तभी वहाँ दंगाई भीड़ ने हमला किया और उनके सिर में ड्रिल कर डाला। दिनेश खटीक अपने बच्चों के लिए दूध लेने निकले थे, उन्हें गोली मार दी गई सिर में। इसी तरह आलोक तिवारी भोजन खा कर टहलने निकले, उन्हें मार डाला गया। उनके अंतिम संस्कार के लिए भी परिवार के पास रुपए नहीं थे। ताहिर हुसैन की ईमारत में जमा सैकड़ों गुंडों ने कई हिन्दुओं को मार डाला और कइयों के घरों को तबाह कर दिया। मंदिरों तक को नहीं बख्शा गया। क्या इन सबको मदद नहीं दी जानी चाहिए? दिक्कत ये है कि पीड़ितों की मदद ‘द प्रिंट’ से इसीलिए देखी नहीं जा रही है क्योंकि इससे लोगों को पता चल रहा है कि कहाँ किस हिन्दू को किस तरह से दंगाई मुस्लिम भीड़ ने मारा। इससे उस गुट के सभी मीडिया संस्थानों की पोल खुल रही है, जिन्होंने हिन्दुओं की मौतों को छिपाया क्योंकि इसके बाद उन्हें बताना पड़ता कि किसकी मौत कैसे हुई। फिर दंगाइयों की पहचान बतानी पड़ती, जो उनके प्रोपेगंडा में फिट नहीं बैठता। इसीलिए, आज कोई व्यक्ति पीड़ितों, मार डाले गए हिन्दुओं के परिवारों और बच्चों के लिए खड़ा हुआ है तो उनसे देखा नहीं जा रहा। कपिल मिश्रा भी इन पोर्टलों को भाव नहीं दे रहे। उनका कहना है- “ये जितनी गाली दे रहे हैं, उससे जनता उतनी ज्यादा जागरूक होकर इस धर्म कार्य में सहयोग कर रही हैं।“ इसके लिए मैं पुनः सबका आभार प्रकट करता हूँ।


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