• Parvati Jangid Suthar

सरकार और समाज की अनदेखी से धुंधली पड़ती सांस्कृतिक विरासत

सरकार और समाज की अनदेखी से धुंधली पड़ती सांस्कृतिक विरासत

(मैं बिहार के सीमान्त क्षेत्रों में "सीमा प्रहरी और सीमाजन संवाद यात्रा" पर थी, लौरिया-नंदनगढ़ के बौद्ध स्तूप पर 22दिसम्बर व विश्व के सबसे ऊँचे बौद्ध स्तूप, केसरिया बौद्ध स्तूप, पूर्वी चम्पारण जिला में 23दिसम्बर,2020 को पहुंची, दिव्य पुरातन विरासत देख बहुत ख़ुशी हुई तो उसकी उपेक्षा देख बहुत दुःख)

(Image: @officialparvati/ 22-12-2020, बौद्ध स्तूप-लौरिया-नंदनगढ़)

आइये जानें इस धुंधली पड़ती सांस्कृतिक विरासत को और संकल्प करें इसके सरंक्षण का

बिहार के चम्पारण ज़िले की माटी की अपनी विशेषता है। इसका अपना इतिहास रहा है। जहाँ एक तरफ़ ये महात्मा गांधी की कर्मभूमि है वहीं ये धरती भगवान बुद्ध के इतिहास के साथ भी जुड़ी है। ये धरती पूरे विश्व में फैले बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए हमेशा से ख़ास रही है। सम्राट अशोक और महात्मा बुद्ध की याद में इतराती रही है। लेकिन धीरे-धीरे ये धरती सुविधाओं के अभाव में मद्धम सी पड़ने लगी है। देश की पुरानी मगर बेहद ही महत्वपूर्ण सांस्कृतिक विरासत धुंधली होने लगी है।

(Image: @officialparvati/ 22-12-2020, बौद्ध स्तूप-लौरिया-नंदनगढ़)

बिहार के बेतिया में लौरिया नंदनगढ में छिपे हैं कई राज

ऐतिहासिक विरासत का खजाना है ये इलाका, पर मैंने वहां जाकर समाज और सरकार की उपेक्षा देखी,वो सही ना जाए…

बिहार के पश्चिम चम्पारण के ज़िला मुख्यालय बेतिया से 14 मील दूर लौरिया नंदनगढ़ का बौद्ध इतिहास क़ाफ़ी महत्वपूर्ण है, बौद्ध ग्रंथों में उल्लेख आया है कि बुद्ध अपने महापरिनिर्वाण-स्थल कुशीनगर जाने के क्रम में वैशाली और केसरिया के बाद यहां ठहरे थे और लोगों को धम्म का उपदेश दिया था। लेकिन अब ये ऐतिहासिक धरोहर बदहाल है। इसकी कोई ख़ैर-ख़बर लेने वाला नहीं है। यहाँ लगे बोर्ड से भी इसका इतिहास धीरे-धीरे ग़ायब होता नज़र आ रहा है।

(Image: @officialparvati/ 22-12-2020, बौद्ध स्तूप-लौरिया-नंदनगढ़)

यही वजह है कि यह स्थानीय लोगों की नज़र में ऐतिहासिक धरोहर से अधिक प्रेमी जोड़ों का आदर्श स्थान बन चुका है। श्रेणीबद्ध खुदाई द्वारा ईंट से निर्मित 24.38 मीटर ऊंचे स्तूप के अवशेषों पर स्थानीय महिलाएं घास काटतीं या इस पर उग आए पेड़ों से अपने घर के चूल्हे के लिए लकड़ियाँ तोड़ती ज़रूर मिल जाएंगी। स्तूप के आस-पास की बाउंड्री वाल टूटी हुई है। स्थानीय लोग अपनी बकरियों व भैसों को लेकर घुस जाते हैं। जगह जगह बकरियां भैंसे चर रही है तो ग्वाले अपने पशुओं का यही ठिकाने बनाने लग गए।

(Image: @officialparvati/ 22-12-2020, बौद्ध स्तूप-लौरिया-नंदनगढ़)

इस ऐतिहासिक धरोहर के विकास की ओर अगर सरकार ध्यान दे दे तो क़ाफ़ी पर्यटक आएंगे। इससे पूरे विश्व में चम्पारण के इस नंदनगढ़ का नाम होगा। लेकिन सच तो ये है कि चंपारण का लौरिया स्थित नंदनगढ़ बौद्ध स्तूप राष्ट्रीय मानचित्र से काफ़ी दूर हो चुका है। इसकी देख-रेख को लेकर सरकार बिल्कुल भी चिंतित नहीं है। जबकि  लौरिया नंदनगढ़ की ब्रांडिंग बिहार सरकार इंग्लैंड में जाकर भी कर चुकी है। एक ख़बर के मुताबिक़ साल 2019 में विशेषज्ञों की एक टीम ने इंग्लैंड में आयोजित बौद्ध धर्मावलंबियों के एक कार्यक्रम में शिरकत की और वहाँ से कई कारगर जानकारी भी हासिल की। इस कार्यक्रम में बिहार सरकार के इन प्रतिनिधयों ने नंदनगढ़ परिसर को विकसित करने की दिशा में कई प्रेजेंटेशन भी दिखाए व इस क्षेत्र की ब्रांडिंग भी की। 

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विश्व का सबसे ऊंचा केसरिया बौद्ध स्तूप, बाउंड्री वॉल का एक हिस्सा ध्वस्त

(Image: @officialparvati/ 23-12-2020, केसरिया बौद्ध स्तूप)

केसरिया पूर्वी चम्पारण से 35 किलोमीटर दूर दक्षिण साहेबगंज - चकिया मार्ग पर लाल छपरा चौक के पास अवस्थित है| यह पुरातात्विक महत्व का प्राचीन ऐतिहासिक स्थल है| यहाँ एक वृहद् बौद्धकालीन स्तूप है जिसे केसरिया स्तूप के नाम से जाना जाता है| बुद्ध ने वैशाली से कुशीनगर जाते हुए एक रात केसरिया में बितायी थी तथा लिच्छविओं को अपना भिक्षा  पात्र प्रदान किया था |

(Image: @officialparvati/ 23-12-2020, केसरिया बौद्ध स्तूप)

कहा जाता है की जब भगवान बुद्ध यहाँ से जाने लगे तो लिच्छविओं ने उन्हें रोकने का काफी प्रयास किया| लेकिन जब लिच्छवि नहीं माने तो भगवान बुद्ध ने उन्हें रोकने के लिए नदी में कृत्रिम बाढ़ उत्पन की| इसके पश्चात ही भगवान् बुद्ध यहाँ से जा पाने में सफल हो सके थे| सम्राट अशोक ने यहाँ एक स्तूप का निर्माण करवाया था| वर्तमान में यह स्तूप 1400 फ़ीट के क्षेत्र में फैला हुआ है| केसरिया बौद्ध स्तूप की ऊंचाई आज भी 104 फ़ीट है , इसे विश्व का सबसे बड़ा स्तूप माना जाता है|

(Image: @officialparvati/ 23-12-2020, केसरिया बौद्ध स्तूप)


एक बार हो आइए…

“अगर आपको भीड़-भाड़ और शोरगुल से दूर किसी एकांत ऐतिहासिक और धार्मिक पर्यटन-स्थल की तलाश है तो कुछ वक्त इस स्तूप पर जरूर बिताकर आईए ! यहां के रहस्यमय वातावरण में आपको एक अद्भुत शांति मिलेगी।” 

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