• Parvati Jangid Suthar

श्री दशरथ मांझी: इतिहास की सबसे शानदार सच्ची प्रेम कहानी

"अपने बुलंद हौसलों और खुद को जो कुछ आता था, उसी के दम पर मैं मेहनत करता रहा। संघर्ष के दिनों में मेरी मां कहा करती थीं कि 12 साल में तो घूरे के भी दिन फिर जाते हैं. उनका यही मंत्र था कि अपनी धुन में लगे रहो, बस, मैंने भी यही मंत्र जीवन में बांध रखा था कि अपना काम करते रहो, चीजें मिलें, न मिलें इसकी परवाह मत करो। हर रात के बाद दिन तो आता ही है- दशरथ मांझी का वक्तव्य"


श्री दशरथ मांझी: इतिहास की सबसे शानदार सच्ची प्रेम कहानी

नमस्कार मित्र बंधुओं,

मैं बिहार के सीमान्त क्षेत्रों में "सीमा प्रहरी और सीमाजन संवाद यात्रा" पर थी, सशस्त्र सीमा बल के साथ प्रवास की जानकारी मैंने साझा की थी, इस दौरान गया से ३५ किलोमीटर दूर स्थित गहलौर की पहाड़ी, एक दिव्य प्रेरणा स्थली पर भी जाने का सौभाग्य मिला, आइये जानें उस दिव्य प्रेरणा पुंज के बारे में।

श्री दशरथ माँझी को पहाड़ तोड़ने के लिए विश्वकर्मा वंशज श्री शिवू मिस्त्री ने दिए 22 वर्षों तक नि:शुल्क छेनी-हथौड़ा, जब किसी ने साथ नहीं दिया तो श्री शिवू मिस्त्री ने बढ़ाया हौंसला। आज जिन माउंटेन मैन श्री दशरथ मांझी को दुनिया याद करती है, उनकी कहानी को पहली बार राज्‍यसभा के उपसभापति श्री हरिवंश ने ही अपने अखबार प्रभात खबर में प्रकाशित किया था, मैं श्री दशरथ माँझी के साथ इन दोनों महाशयों को नमन करती हूँ।


मांझी: एक दिव्य प्रेरणा पुंज

अगर कोई इंसान चाहें तो वो क्या नहीं कर सकता, वो चाहें तो अकेले दम पर पहाड़ भी तोड़ सकता हैं, सही पढ़ा आपने ये बात केवल बोलने या पढ़ने तक ही सीमित नहीं हैं बल्कि इस देश की मिट्टी से एक ऐसे शख्स ने जन्म लिया था जिसने अकेले दम पर 25 फीट ऊंचे और 360 फीट लंबे पहाड़ को तोड़कर वहां से रास्ता बनाया था। मैं जिस शख्स की बात कर रही हूँ उनका नाम हैं श्री दशरथ मांझी जिन्हें लोग माउंटेन मैन के नाम से ज्यादा जानते हैं, आज मैं आपकों उसी माउंटेन मैन यानी श्री दशरथ मांझी की जीवनी बताने जा रही हूँ, मैंने २६ दिसंबर, २०२० को गहलौर की पहाड़ी जाकर उस दिव्य पुंज को नमन किया और यादें आप सबके प्रेरणा के लिए समर्पित हैं।

नाम- श्री दशरथ मांझी जन्म- 14 जनवरी 1929 मृत्यु- 17 अगस्त 2007 जन्म स्थल- गहलौर (बिहार) पत्नी का नाम- श्रीमति फगुनिया मरने की वजह- कैंसर श्री मांझी के जन्म के समय पूरे देश में ब्रिटिश साम्राज्य था, देश के साथ-साथ इनके गांव की हालत भी बहुत खराब थी, जब देश अंग्रेजो से आजाद हुआ तो उसके बाद धनाढ्य लोगों ने अपना आधिपत्य जमाना शुरू कर दिया। गांवों में जमीदार गरीब और अनपढ़ लोगों का शोषण करने लगें, मांझी का परिवार भी अति-निर्धन था। भले ही देश आजाद हो चुका था लेकिन गांव में ना तो बिजली थी, ना ही पानी था और ना ही कोई पक्की सड़क, गांव के निवासियों को इलाज के लिए भी गांव में अस्पताल ना होने के कारण बड़े से पहाड़ को पार कर शहर जाना पड़ता था। मांझी का बाल विवाह हो गया था, उनके पिता ने गांव के ही जमीदार से कुछ पैसे कर्जे के रूप में लिए थे जिसे वो चुका नहीं पाए तो उसके एवज में वो अपने बेटे मांझी को उस जमीदार का बंधुआ मजदूर बनने को कहते हैं लेकिन बचपन से ही मांझी को किसी की गुलामी करना पसंद नहीं था और इसी वजह से वो गांव छोड़कर कहीं भाग जाते हैं और धनबाद में एक कोयले की खदान में काम करने लगते हैं। श्री मांझी का दुबारा गांव गाँव लौटना

श्री दशरथ मांझी सन 1955 के आसपास वापस अपने गांव लौट आते हैं लेकिन वो देखते हैं कि गांव के हालातों में कोई भी बदलाव नहीं हुआ हैं भले ही गांव की गरीबी हो, कच्ची सड़क हो, बिजली का ना होना हो सब वैसे ही था, वापिस गांव आने पर उन्हें इस बात की भी जानकारी मिलती हैं कि उनकी मां का देहांत हो चुका हैं। कुछ दिनों बाद मांझी को एक लड़की अच्छी लगने लगती हैं और उन्हें पता चलता हैं कि इसी लड़की से बचपन में उनकी शादी हो चुकी हैं, ये जानकर वो लड़की के घर लड़की को लेने जाते हैं पर लड़की के पिता ये कहकर मना कर देते हैं कि लड़का कुछ कमाता नहीं हैं पर दशरथ और वो लकड़ी फगुनिया एक दूसरे से प्रेम करने लगते हैं और दोनों भाग कर शादी कर लेते हैं।

जब पहाड़ को तोड़ने का लेते हैं प्रण 1960 में उनकी पत्नी दूसरी बार गर्भवती हो गई थी, उन दिनों दशरथ को पहाड़ के दूसरी तरफ कुछ काम मिल जाता हैं, ऐसे में हर रोज फगुनिया उसे खाना देने जाती थी लेकिन एक दिन फगुनिया का पैर फिसल जाता हैं और वो गिर जाती हैं। दशरथ फगुनिया को शहर के अस्पताल में ले जाता हैं जहां वो अपने गर्भ में पल रही बेटी को जन्म दे देती हैं लेकिन अगले ही पल वो खुद मर जाती हैं। इस घटना ने मांझी को पूरी तरह से झकझोर कर रख दिया। दशरथ सोचते हैं की अगर इस पहाड़ी में रास्ता होता तो मेरी पत्नी न पहाड़ी के दर्रे में गिरती, रास्ता होता तो अस्पताल भी समय पर पहुंचा जा सकता था और मेरी पत्नी बच सकती थी। इन विचारों ने माँझी में उस पहाड़ी को तोड़ने ज्वार पैदा किया और मन ही मन ये निश्चय करते हैं कि जिस पहाड़ की वजह से उनकी फगुनिया मरी हैं वो उस पहाड़ का घमंड तोड़ कर पूरा पर्वत ही तोड़ देंगे। पहाड़ को तोड़ने का शुरू हुआ सिलसिला हर रोज सुबह मांझी अपना हथौड़ा और छैनी लेकर घर से निकल जाते थे मानों कि कही काम पर जा रहें हो, उनको पहाड़ तोड़कर सब उन्हें ताने मारते थे कोई कहता था कि मांझी पागल हो गया हैं तो कोई कहता था कि ये तो सनकी हैं लेकिन दशरथ ने कभी भी किसी की बात पर ध्यान नहीं दिया और लगातार पहाड़ तोड़ने का काम किया। कई बार उन्हें चोट भी लगी, उन्हें उनके पिता ने बहुत समझाया लेकिन अब तो दशरथ मांझी पहाड़ को तोड़ने की हठ ले चुके थे। काफी साल बीत जाने के बाद गांव में सूखा पड़ा जिसके कारण सभी गांव वाले गांव छोड़कर कही और जाने लगते हैं तो दशरथ खुद ना जाकर अपने बच्चों को अपने पिता के साथ गांव से भेज देता हैं, सुखे के समय दशरथ गंदा पानी और पेड़ की पत्तियों को खा कर जिंदा रहे। जब गांव में सुखा खत्म हो गया तो सभी गावँ वाले वापस आने लगे और गांव पहुंच कर वो लोग देखते हैं कि मांझी अभी भी पहाड़ तोड़ रहा हैं तो सब हैरान रह जाते हैं। जब देश में लगा था आपातकाल सन 1975 में देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी देश में आपातकाल की घोषणा कर दी थी, आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी बिहार के दौरे पर थी और उनकी वहां एक जनसभा होती हैं जिसमें दशरथ भी जाते हैं भाषण के दौरान मंच टूट जाता हैं पर दशरथ समेत कुछ लोग मंच को संभाल लेते हैं जिसके बाद इंदिरा गांधी अपना भाषण पूरा करती हैं, आखिर में दशरथ ने इंदिरा गांधी के साथ फोटो खिंचवाई। इस बात की खबर जब गांव के जमींदार को लगी तो उसने दशरथ को अपनी मीठी बातों से झांसे में फंसा लिया और मांझी को धोखा दे दिया, पता चलने पर मांझी जमींदार की शिकायत इंदिरा गांधी से करने के लिए निकल जाता हैं। बिहार से दिल्ली की पैदल यात्रा दशरथ मांझी ट्रेन से दिल्ली जा रहें थे लेकिन उनके पास ट्रेन का किराया भी नहीं था इसलिए उन्हें टीटी ने ट्रेन से नीचे उतार दिया, लेकिन फिर भी दशरथ के कदम नहीं रुकें और वो पैदल ही ट्रेन की पटरी पर चलतें हुए दिल्ली की तरह निकल पड़े। दिल्ली में उन दिनों हालात ठीक नहीं थे, दशरथ ने इंदिरा गांधी के आवास के बाहर सुरक्षाकर्मियों को अपनी इंदिरा गांधी के साथ वाली फोटो दिखाई लेकिन उन्होंने उस फोटो को फाड़ कर उसे बिना मिले ही वहां से भगा दिया।

जब और लोग मांझी की मदद के लिए आए आगे दिल्ली से निराश होकर मांझी वापस बिहार आए, अब उनकी लगभग सभी उम्मीदें टूट चुकी होती हैं लेकिन कुछ लोग मांझी की हिम्मत बढ़ाने के लिए आगे आते हैं और उनकी पहाड़ तोड़ने में मदद करते हैं गांव के जमींदार को जब ये पता चलता हैं तो वो कुछ लोगों को मांझी के समेत जेल में बंद करवा देता हैं। लेकिन तभी एक पत्रकार मांझी के लिए खड़ा होता हैं और गांव वालों को लेकर थाने के सामने प्रदर्शन करता हैं आखिरकार दशरथ को छोड़ दिया जाता हैं। आखिकार तोड़ ही दिया पहाड़ आखिरकार 1982 में मांझी ने उस 360 फीट लंबे, 30 फीट चौड़े और 25 फीट ऊंचे पहाड़ को पूरी तरह से तोड़ देता हैं जिसकी वजह से 55 किमी का रास्ता केवल 15 किमी का ही रह जाता हैं, उनकी इस कार्य के लिए उन्हें 2006 में पद्मश्री से नवाजा गया। जब दशरथ जिंदगी की जंग हार गए दशरथ मांझी का 17 अगस्त 2007 को गाल ब्लाडर में कैंसर से निधन हो गया, अपने अंतिम समय में दशरथ ने अपने जीवन पर फिल्म बनाने की अनुमति दी थी, उनके जीवन पर बनी फिल्म में नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने उनका और राधिका आप्टे ने उनकी पत्नी फगुनिया का किरदार निभाया।

राज्‍यसभा के उपसभापति और सांसद श्री हरिवंश नारायण सिंह के चुने जाने के बाद उच्‍च सदन में उनको बधाई देते हुए प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने उनके कई अनछुए पहलुओं के बारे में सदन को बताने के दौरान कहा था कि आज जिन माउंटेन मेन श्री दशरथ मांझी को दुनिया याद करती है, उनकी कहानी को पहली बार श्री हरिवंश ने ही अपने अखबार प्रभात खबर में प्रकाशित किया था. इस पर्वत पुरुष को सर्वप्रथम दुनिया से रूबरू कराने के लिए श्री हरिवंश जी का भी आभार और पर्वत पुरूष श्री दशरथ माँझी को 22 वर्षों तक नि:शुल्क छेनी-हथौड़ा पहाड़ तोड़ने के लिए हैमर मैन शिवू मिस्त्री ने प्रदान किये। उन्हीं के दिए छेनी-हथौड़े से दशरथ माँझी ने पहाड़ काटकर रास्ता बनाया। श्री दशरथ के कार्य में जान फूँकी थी, श्री मिस्त्री का अहम योगदान रहा, मैं विश्वकर्मा वंशज श्री शिवू मिस्त्री को भी नमन करती हूँ।

मैं तो यही कहना चाहूंगी कि ऐसी हिम्मत के धनी इंसान यदा-कदा ही जन्म लेते हैं. हमें इन्हें अपना प्रेरणास्रोत बनाना चाहिए. मुझे रंज उस शख्स से न मिल पाने का है क्योंकि 2007 में दशरथ मांझी इस दुनिया से विदा हो गए. लेकिन उनकी कर्मस्थली,उस गहलौर की पहाड़ी, उनकी समाधी स्थली पर जाकर बहुत प्रेरणा मिली। नमन।


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