• Parvati Jangid Suthar

विश्व को मैत्री व शांति का संदेश दे रहा "विश्व शांति स्तूप राजगृह"

मैं लोकनाथ हूँ, भैषज्यगुरु हूँ...

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विश्व को मैत्री व शांति का संदेश दे रहा "विश्व शांति स्तूप राजगृह" बिहार

#BiharDiaries

बिहार के सीमान्त क्षेत्रों में "सीमा प्रहरी और सीमाजन संवाद यात्रा" के दौरान विश्व शांति स्तूप राजगृह/राजगीर" बिहार के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

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Special Thanks to #SSB

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आज की भागम-भाग वाली दुनिया में लोगों के पास जिंदगी के लिए वक्त नहीं है, हर खुशी है लोगों के दामन में, पर एक हंसी के लिए वक्त नहीं है. पौराणिक वे ऐतिहासिक स्थलों की सैर व भ्रमण से शरीर में ताजगी व नयी ऊर्जा का संचार होता है और सालों साल की थकान दूर हो जाती है. सैर करने के लिए सर्दी का मौसम सबसे उपयुक्त होता है, मैं राष्ट्रदेव और सीमाप्रहरीयों को समर्पित कार्य कर रही हूँ,इसी सिलसिले राजगीर भी जाने का सौभाग्य मिला।

सैर व भ्रमण तथा हमारी सांस्कृतिक धरोहरों को सामान्यजन तक पहुँचाने के लिए लोगों को प्रेरित करने के उद्देश्य से मैं लगातार ऐतिहासिक, पौराणिक व धार्मिक स्थलों के बारे में प्रसार कर रही हूँ. इसी कड़ी में मैं, भगवान बुद्ध से जुड़े स्थल राजगीर के रत्नागिरि पर्वत पर स्थित विश्व शांति स्तूप की जानकारी आपको दे रही हूँ. राजगीर के रत्नागिरि पर्वत पर विश्व प्रसिद्ध पर्यटन स्थल और आस्था का केंद्र है. इस विश्व शांति स्तूप का निर्माण 1978 में गौतम बुद्ध की 2600 जयंती के मौके पर किया गया था.

जापान के फूजी गुरुजी के प्रयास से इसका निर्माण कराया गया था. इसका डिजाइन वास्तुकार उपेंद्र महारथी ने तैयार किया था. स्तूप का गुंबद 72 फुट ऊंचा है. भगवान बुद्ध ने इसी स्थल से विश्व को शांति का उपदेश दिया था. यहां हर वर्ष विश्व शांति स्तूप का वार्षिकोत्सव मनाया जाता है. इस अवसर पर देश-विदेश के बौद्ध भिक्षु बड़ी संख्या में यहां जमा होते हैं.

एक रोपवे और दूसरा सीढ़ी के माध्यम से पैदल. रत्नागिरि पर्वत के पास ही गृद्धकूट पर्वत है. इस पर्वत पर भगवान बुद्ध ने कई महत्वपूर्ण उपदेश दिये थे. भगवान बुद्ध का यह प्रिय स्थल रहा है. बुद्धत्व प्राप्ति के बाद गौतम बुद्ध ने बौद्ध भिक्षुओं को कई साल बरसात के मौसम में प्रेरणात्मक उपदेश दिया था. विश्व शांति स्तूप शांति व मैत्री का प्रतीक है. यहां भगवान बुद्ध की चार सुनहरी प्रतिमाएं हैं. राजगीर के अपने लंबे प्रवास के दौरान बुद्ध ने इसी चोटी पर ध्यान लगाया था.

विशाल सफेद स्तूप शांति का अहसास करता है और इससे राजगीर घाटी की खूबसूरती में चार चांद लगता है. विश्व शांति स्तूप अध्यात्म की बुलंदियों को स्पर्श करने का एक शानदार जगह है.

राजगीर एक ऐसी जगह है, जो सभी धर्मों को एक साथ जोड़ती है और यह संदेश देता है कि सब लोग भाई चारे के साथ आपस में मिल-जुलकर रह सकते हैं. आप चाहे जिस भी धर्म के हो, आपको राजगीर में निश्चित तौर पर शांति का अहसास और दैविकता से जुड़ने का अवसर मिलेगा.

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आइये जानें "विश्व शांति स्तूप (विश्व शांति शिवालय) राजगृह" के बारे में...

रत्नागिरी हिल के ऊपर निर्मित, यह दुनिया का सबसे ऊंचा शांति पैगोडा है।

प्रसिद्ध बौद्ध भिक्षु निप्पोंज़न मायोहोजी द्वारा निर्मित और जापानी भिक्षु फ़ूजी गुरुजी द्वारा निर्मित।

पूरी तरह से संगमरमर से निर्मित, स्तूप में भगवान बुद्ध की चार स्वर्ण प्रतिमाएँ हैं, जिनमें से प्रत्येक में उनके जीवन काल, ज्ञानोदय, उपदेश और मृत्यु का प्रतिनिधित्व है।

भारत में 7 शांति पैगोडा या शांति स्तूप हैं, अन्य स्तूप हैं ग्लोबल विपश्यना पैगोडा मुंबई, दीक्षाभूमि स्तूप नागपुर और बुद्ध स्मृति पार्क स्तूप पटना।

राजगीर के बारे में:

पहली बौद्ध परिषद इस जगह जो वर्तमान में राजगीर कहा जाता है पर बुलाई गई थी।

यह गिद्धाकुटा , गिद्धों की पहाड़ी पर था, जहाँ बुद्ध ने मौर्य राजा बिम्बिसार को बौद्ध धर्म में परिवर्तित किया था।

राजगीर को पंचपहाड़ी के रूप में भी जाना जाता है क्योंकि यह पाँच पवित्र पहाड़ियों से घिरा हुआ है।

किंवदंती है कि भगवान बुद्ध के ज्ञान प्राप्त करने से पहले ही प्राचीन शहर राजगृह मौजूद था। यह 5 वीं शताब्दी ईसा पूर्व तक मगध शासकों की प्राचीन राजधानी थी जब अजातशत्रु ने राजधानी को पाटलिपुत्र (जो अब पटना के रूप में जाना जाता है) में स्थानांतरित कर दिया ।

भगवान महावीर ने भी अपने जीवन के 14 वर्ष राजगीर और आस-पास के क्षेत्रों में बिताए।

पटना से 100 किमी उत्तर में पहाड़ियों और घने जंगलों के बीच बसा राजगीर एक प्रसिद्ध धार्मिक तीर्थस्थल के रूप में दुनियाभर में लोकप्रिय है। ये एक अंतरराष्ट्रीय पर्यटन स्थल है। ये जैन, बौद्ध और हिन्दू धर्मावलंबियों का तीर्थ है। खासकर बौद्ध धर्म से इसका प्राचीन संबंध है। पांच पहाड़ियों से घिरा राजगीर आज उम्मीदों के नए पहाड़ पर खड़ा है। पहले यहां सरस्वती नदी भी बहती थी। बिहार में प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर प्राचीन पौराणिक और ऐतिहासिक स्थलों की लंबी श्रृंखला है। राजगीर और इसके आसपास के ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व के स्थलों में सप्तपर्णि गुफा, विश्व शांति स्तूप, सोन भंडार गुफा, मणियार मठ, जरासंध का अखाड़ा, बिम्बिसार की जेल, नौलखा मंदिर, जापानी मंदिर, रोपवे, बाबा सिद्धनाथ का मंदिर, घोड़ाकटोरा डैम, तपोवन, जेठियन बुद्ध पथ, वेनुवन, वेनुवन विहार, प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय, जैन मंदिर, श्रीकृष्ण भगवान के रथ के चक्कों के निशान, सुरक्षा दीवार, सामस स्थित तालाब और तेल्हार आदि देख सकते हैं। बिहार का एक छोटा-सा शहर है राजगीर, जो कि नालंदा जिले में स्थित है। राजगीर में सोन भंडार गुफा भी है ‍जिसके बारे में यह किंवदंती है कि इसमें बेशकीमती खजाना छुपा हुआ है जिसे आज तक कोई नहीं खोज पाया है।

देवनगरी राजगीर कई धर्मों की संगमस्थली है। यह राजगीर जैन, बौद्ध और हिन्दू धर्मावलंबियों का तीर्थ है। जैन धर्म में 11 गंधर्व हुए और उन सभी का निर्वाण राजगीर में हुआ। यहां की 5 पहाड़ियां मसलन विपुलगिरि, रत्नागिरि, उदयगिरि, सोनगिरि, वैभारगिरि हैं। इन सभी पहाड़ियों पर जैन धर्म के मंदिर हैं। भगवान महावीर ने ज्ञान प्राप्ति के बाद पहला उपदेश विपुलगिरि पर्वत पर दिया था। इसके अलावा राजगीर के आस-पास की पहाड़‍ियों पर 26 जैन मंदिर बने हुए हैं, पर वहां पहुंचना आसान नहीं है, क्योंकि वहां पहुंचने का रास्ता अत्यंत दुर्गम है। भगवान बुद्ध भी रत्नागिरि पर्वत के ठीक बगल में स्थित गृद्धकूट पहाड़ी पर उपदेश देते थे। इस पहाड़ी पर उस स्थल के अवशेष मौजूद हैं। बुद्ध के निर्वाण के बाद बौद्ध धर्मावलंबियों का पहला सम्मेलन वैभारगिरि पहाड़ी की गुफा में हुआ था। इसी सम्मेलन में पालि साहित्य का उम्दा ग्रंथ 'त्रिपिटक' तैयार हुआ था। बोधगया से राजगीर भगवान बुद्ध जिस मार्ग से आए थे उसमें भी अनेक स्थल हैं। नालंदा, पावापुरी, राजगीर और बोधगया एक कड़ी में हैं। जापानी बुद्ध संघ ने विश्व शांति स्तूप भी बनवाया हुआ है।

विपुलगिरि पर्वत जरासंध की राजधानी थी। भीम और जरासंध के बीच 18 दिनों का मल्लयुद्ध यहीं हुआ था। जरासंध इसमें भगवान श्रीकृष्ण की कूटनीति से मारा गया था। राजगीर में हर 3 साल के बाद मलमास मेला लगता है। देश-दुनिया के श्रद्धालु यहां प्रवास करते हैं और गर्म कुंडों में स्नान कर पाप से मुक्ति की कामना करते हैं। पौराणिक नगरी राजगीर तीर्थ के बारे में भारतीय ग्रंथ 'वायु पुराण' के अनुसार मगध सम्राट बसु द्वारा राजगीर में 'वाजपेय यज्ञ' कराया गया था। उस यज्ञ में राजा बसु के पितामह ब्रह्मा सहित सभी देवी- देवता राजगीर पधारे थे। यज्ञ में पवित्र नदियों और तीर्थों के जल की जरूरत पड़ी थी। कहा जाता है कि ब्रह्मा के आह्वान पर ही अग्निकुंड से विभिन्न तीर्थों का जल प्रकट हुआ था। उस यज्ञ का अग्निकुंड ही आज का ब्रह्मकुंड है। उस यज्ञ में बड़ी संख्या में ऋषि-महर्षि भी आते हैं। पुरुषोत्तम मास, सर्वोत्तम मास में यहां धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति की महिमा है।

किंवदंती है कि भगवान ब्रह्मा से राजा हिरण्यकश्यप ने वरदान मांगा था कि रात-दिन, सुबह-शाम और उनके द्वारा बनाए गए 12 मास में से किसी भी मास में उसकी मौत न हो। इस वरदान को देने के बाद जब ब्रह्मा को अपनी भूल का अहसास हुआ, तब वे भगवान विष्णु के पास गए। भगवान विष्णु ने विचारोपरांत हिरण्यकश्यप के अंत के लिए 13वें महीने का निर्माण किया। धार्मिक मान्यता है कि इस अतिरिक्त 1 महीने को मलमास या अधिकमास कहा जाता है। वायु पुराण एवं अग्नि पुराण के अनुसार इस अवधि में सभी देवी-देवता यहां आकर वास करते हैं। इसी अधिकमास में मगध की पौराणिक नगरी राजगीर में प्रत्येक ढाई से तीन साल पर विराट मलमास मेला लगता है। यहां आने वाले लाखों श्रद्धालु पवित्र नदियों प्राची, सरस्वती और वैतरणी के अलावा गर्म जलकुंडों यथा ब्रह्मकुंड, सप्तधारा, न्यासकुंड, मार्कंडेय कुंड, गंगा-यमुना कुंड, काशीधारा कुंड, अनंत ऋषि कुंड, सूर्य कुंड, राम-लक्ष्मण कुंड, सीता कुंड, गौरी कुंड और नानक कुंड में स्नान कर भगवान लक्ष्मी नारायण मंदिर में आराधना करते हैं। प्राचीन धरोहरों की राजधानी राजगीर में राजस्थान, पश्चिम बंगाल, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, कर्नाटक के अलावा श्रीलंका, थाईलैंड, कोरिया, जापान, चीन, बर्मा, नेपाल, भूटान और अमेरिका और इंग्लैंड से भी पर्यटकों का आना होता है।


कैसे पहुंचें राजगीर? सड़क मार्ग- सड़क परिवहन द्वारा राजगीर जाने के लिए पटना, गया, दिल्ली से बस सेवा उपलब्ध है। इसमें बिहार राज्य पर्यटन विकास निगम अपने पटना स्थित कार्यालय से नालंदा एवं राजगीर के लिए टूरिस्ट बस एवं टैक्सी सेवा भी उपलब्ध करवाता है। इसके जरिए आप आसानी से राज‍गीर पहुंच सकते हैं। रेल मार्ग- रेलमार्ग के लिए पटना एवं दिल्ली से सीधी रेल सेवा यात्रियों के लिए उपलब्ध है, जहां यात्री आसानी से राजगीर पहुंच सकते हैं। हवाई मार्ग- यहां पर वायुमार्ग से पहुंचने के लिए निकटतम हवाई अड्डा पटना है, जो करीब 107 किमी की दूरी पर है।


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